विष चिकित्सा (Toxicology) का ईलाज कैसे करे

विष चिकित्सा का ईलाज कैसे करे


विष चिकित्सा (Toxicology)
विष चिकित्सा (Toxicology)
परिचय- कई बार कई लोग स्वयं विष खा लेते या धोखे से शत्रु विष खिला देते हैं। नीचे प्रमुख विष चिकित्सा प्रस्तुत है।

1. धतूरा-

लक्षण- गला सूख जाना, लड़खड़ाना, प्यास लगना, अनाप शनाप बकना, नेत्र की पुतलियाँ फैलाना, चेहरा लाल, कल्पना में चीजों को पकड़ने के लिये हाथ उठाना, चेष्टा करना और फिर बेहोश हो जाना, सिर में चक्कर, आक्षेप आदि। 
     चिकित्सा- (1) कैल्शियम ल्यूकोरिन Calcium Leucovorin (नाथ)- एक मि.ली. (3 से 6 मि.ग्रा.) के एम्पुल का चर्म या माँस में इंजेक्शन लगाकर तुरन्त वमन करायें।
(2) सिर पर ठंडे जल या बर्फ की रैली रख दें।
(9) रिफाइण्ड कैस्टर ऑयल पिलायें। मात्रा 30 मि.ली. या अधिक।
(4) सोडियम क्लोराइड को नमक गर्म जल में घोलकर पिलाकर के करायें।
(5) घी गर्म करके पिलाएं।
(6) यदि उपरोक्त विधियों से के न हो तो स्टॉक ट्यूब द्वारा आमाशय के अन्दर के विषले अंश को बाहर निकाले । पोटेशियम परमैंगनेट के योग से आमाशय को धोवे ।
(7) एमीटॉक्स Ammeter (पीरामल हेल्थ केयर)--एक इंजेक्शन मांस में लगायें।
(8) हदय की शक्ति देने के लिये डाइगाक्सिन Digoxin (जी.एस.के)-2 से 4 मि.ली. को 50 मि.ली. डेक्स्ट्रीज 28 प्रतिशत विलयन में घोलकर धीरे-धीरे शिरा में इंजेक्शन लगायें।
(9) पिलोकार्पिन नाइट्रेट Pilocarpine Nitrate (यूनिक)--15 मि.ग्रा. को त्वचा में इंजेक्शन प्रतिविष के रूप में लगायें।
(10) प्रलाप को दूर करने के लिये घर या क्लोरोफॉर्म सुचाएं ।
(11) कैफीन Caffeine (बी.आई.)-एक एप्पल का त्वचा में इंजेक्शन लगाएं।
(12) धतूरा जैसे बनस्पतिक विष को आमाशय में निष्क्रिय करने के लिये सू्म पिसा हुआ लकड़ी के कोयले का चूर्ण 5 से 15 ग्राम या अधिक जल से दें। इसकी पुनः दूसरी मात्रा भी दे सकते हैं। कोयले का सूक्ष्म चूर्ण क्षाराभों का शोषण करा देता है। फिर मैग सल्फ का जुलाब देने से विष पाखाना से बाहर निकल जाता है।
(13) शिरा से इन्फ्युजन विधि से सोडियम क्लोराइड 0.9% सॉल्यूशन धीरे-धीरे अन्तःक्षेपित कर । नार्मल सलाइन सॉल्यूशन शिरा मार्ग से दे।
(14) क्रीमाफिन प्लस इमल्शन Cremaffin Plus Emulsion (अब्बोट)-आवश्यकतानुसार 10 से 15 मि.ली. या अधिक समभाग जल मिलाकर दिन में 2-3 बार पिलाने से समस्त विष 2-3 दस्त आकर निकल जाते हैं।
नोट-विध आमाशय से निकलकर आगे चला जाये तब ही उपयुक्त विरेचन (Purgative) द्वारा उसे बाहर निकालें।

2. भांग-

लक्षण- रोगी अधिक हसता और बातें करता है चलता है तो ऊपर नीचे उड़ता एवं भागता हुआ प्रतीत होता है। अधिक प्रताप, अन्त में बेहोश हो जाता है। आँखों की पुतलियाँ, फैली गई। बिना कारण पेशियों में गति, नींद अधिक आती है भूख खूब लगती है और खाने में पता नहीं है।
     चिकित्सा- (1) स्ट्रिकनीन एक मि.ली. का इंजेक्शन चर्म में लगायें।
(2) खहे दही या छाछ पिलायें। (3) खटाई खिलायें।
(4) सिर पर बर्फ या ठण्डा जल अथवा बर्फ की थैली रखें।
(5) स्टिक ट्यूब द्वारा आमाशय को साफ करें।
(6) रीठे के छिलकों को जत में या-छानकर बार-बार पिलाने से वमन आकर विप निकल जाता है
(7) सूक्ष्म पिसा हुआ लकड़ी का कोयला के चूर्ण को आवश्यकतानुसार 5 से 15 ग्राम जल से दा फिर क्रीमाफीन प्लस इमल्शन 10 से 15 मि.ली. पिलाने से 2-4 दस्त आकर विष बाहर निकल जाता है।

3. कुचला-

लक्षण- गला पुटता प्रतीत होता, सम्पूर्ण मांसपेशियों में तुरन्त आक्षेप, ऐंठन, पुतलियाँ फैली हुई, पीठ अकड़कर टेढ़ी हो जाना, दाँत जकड़ जाना, नाड़ी निर्धत, तेज चलना, मुखाकृति नीली, मुख से झाग निकलना, श्वासावरोध होना, शरीर पीछे की ओर झुककर धनुष्टंकार जैसा ही जाना, महाप्राचीरा पेशी में ऐण्डन आदि।
     चिकित्सा- (1) एपोमार्फीन का इंजेक्शन मोस या चर्म में लगाकर के करायें।
(2) पोटेशियम परमैंगनेट को गर्म पोल से स्टॉमक ट्यूब द्वारा आमाशय धोयें।
(3) आक्षेप (ऐण्ठन) को दूर करने के लिये ईवर सावधानी से सुधाए ।
(4) सोडियम मेटल (Sodium Amytal) या इंटरवल सोडियम का शिरा (I.N) में प्रतिविष के रूप में इंजेक्शन लगाये।
(5) रोगी को धेरै, ठंड, कोलाहल से दूर और शांत कमरे में रखें।
(6) पोटेशियम ब्रोमाइड और क्लोरल हाइड्रेट को मिलाकर पियें ।
(7)एमाइल नाइट्रेट सुनाए।
(8) गार्डिनल फेनोयाबिटोन सोडियम का इंजेक्शन मांस में लगायें ।
(9) 15 बूंद अमोनिया फोर्ट को पानी में घोलकर पिलाएं।
(10) शिरा मार्ग से नार्मल सेलाइन सॉल्यूशन बूंद-बूंद इन्फ्युजन विधि से 500 से 10,000/ मि.ली. तक दें। यदि हो सके तो सोडियम क्लोराइड के साथ अधिक कमज़ोरी ग्लूकोज सॉल्यूशन मिला हुआ अंतःक्षेपित कर सकते है।
(11) श्वासावरोध में ऑक्सीजन की व्यवस्था करें। श्वसन में बाधा पड़ने पर कृत्रिमश्वास क्या करें।
(12) अति सूक्ष्म मैदा के समान पिसा हुआ कोयला जल में मिलाकर रोगी को पिलावें तथा विरेचन देकर विष को पाखाना द्वारा निकालें।

4. कनेर

लक्षण- निगलने में कष्ट, बोलने में कठिनाई, पेट दर्द, वमन, झाग निकलना, दस्त, नाड़ी तंत्र तथा क्षीण, श्वास-प्रश्वास तीव्र, पतलियाँ फैली हुई, अधिक नींद आना, मॉस अकड़ा हुआ, हनुस्तम्भ, बेहोशी, चेतना नाश आदि।
     चिकित्सा- (1) स्टॉमक ट्यूब से आमाशय को धोयें।
(2) सिर पर ठण्डा जल या बर्फ अथवा बर्फ की थैली रखें।
(3) दूध या मक्खन खिलायें।
(4) ईयर सुँघाना। इससे दर्द एवं कष्ट में राहत मिलेगी।

5. पारा (Mercury)

लक्षण- वमन, दस्त, जीभ सफेद, बेहोशी, अधिक लार बहना, मुख, आमाशय औरआंखों में जलन, जीभ में व्रण, इंजेक्शन तारा प्रयोग होने पर श्वास कष्ट नीलापन, आक्षेप, स्तब्धता, वृक्क शोध आदि।
     चिकित्सा- (1) प्रतिशत सोडियम कोरमाडीहाईड सल्फोसीलेट विलयन से आमाशय को धोयें। (प्रतिविष)।
(2) 2 से 3 प्रतिशत सोडा बाई काय के विलयन से आमाशय को धोकर 200 मि.ली. आमाशय में पड़ा रहने दें।
(3) पीड़ानाश के लिये मॉफिन का इंजेक्शन लगाये।
(4) डेक्सट्रोज (Dextrose) 25 प्रतिशत शक्ति का घोल 50 मि.ली. की मात्रा में धीरे-धीरे शिरा में प्रवेश करें।
(5) चारकोल (लकड़ी का कोयला माता) को जल में घोलकर पिलाये । वह पार का शोषण कर देता है। तब मैग्नीशियम सल्फेट (Magnesium Sulphate) जल में घोलकर पिलायें जिससे 1-2 दस्त आकर पारा निकल जाएगा।
(6) सोडियम बाय सल्फेट (Sodium Thiosulphate) के 10 प्रतिशत घोल का शिरा में इंजेक्शन लगाये।
(7) रिफाइंड कैस्टर ऑयल (आई थी.) कि गाय के दूध में मिलाकर पिलायें (विपनाशक)
(8) बी. एल. इंजेक्शन (BALL Injection)-सामान्यतया 2 मि.लो. (100 मि.ग्रा.) 4. घंटे बाद 48 घण्टे तक मॉल में इेशन बड़ी सावधानी से लगायें।
     साबधानी- आयरन (लोहा) और सीसा (Men) के विष सेवन में, यकृत क्षति तथा
अति रक्तदाब में इसका प्रयोग कदापि नहीं करें।

6. अफीम, मॉफिया और इनसे बनी औषधियां

लक्षण- प्रारम्भ में उत्तेजना, बाद में लाल आम, नींद अधिक आना, पुतलिया छोटी हो जाना, चेहरा और होंठ नीले, बेठोशो, मूर्छा मिथ्याभ्यास (वेहोशी में बेतुको बाले करना), खासावरोच आदि।
     चिकित्सा-(1) एट्रोपीन सल्फेट 15 मि.ग्रा. का त्वचा में बार-बार तब तक इंजेक्शन लगाये, जब तक कि पुलिया फल में जावे।
(2) स्टॉक ट्यूब से आमाशय की 900 मि.या. पोटाशियम परमैगनेट 500 मिली जग में घोलकर तैयार विलयन से धीयें । रोगी की सोने न दें, उसे हर समय जगायें रखें।
(3) केयर से मूत्र निकालना । रेस्ट्रोज 25 प्रतिशत 50 मि.ली. का शिरा में धीरे-धीरे इंजेक्शन लगाये।
(4) कृत्रिम श्वास जारी रखें। शरीर को गर्म रखें। इसके लिये गर्म जल से भरे बोतलों का प्रयोग करें।
(5) 2 से 4 मि.ली. की माला में शिरा में इन्फ्यूजन विधि से डायगोविसन (जी.एस.के.) जक्शन लगायें। हदय शक्ति देने और सॉस जारी करने के लिये लाभप्रद है। 

7. डी.डी.टी. पाउडर

लक्षण- हल्लास, वमन, सूखी खांसी, उत्तेजना, मांसपेशियों में ऐंठन, अगि का असहयोग,पाँव का मारा जाना, संज्ञान, संन्यास, श्वासावरोध और मृत्यु आदि।
     चिकित्सा- (1)नमक को गर्म जल में घोलकर पिलाकर के करायें। स्टमिक या से आमाशय को धोयें
(2) एटीन सल्फेट का त्वचा में इंजेक्शन लगायें।
(৪) कृत्रिम विधि से श्वास जारी करें।
(4) रीठा जल में घोलकर झाग को बार-2 पिताएं

8. मीटा तेलिया, वत्सनाभ विष, एकोनाइट

लक्षण- मुख में जलन और झनझनी, सनसनाहट, अज्ञानता, लार अधिक वरना, ऊपरी पेट में दर्द, श्वास कष्ट, पुतलियों बारी-2 से सिकुड़ना और फेलना, शरीर में सूर्ट भने जैसा दर्द, नाड़ी अनियमित, त्वचा मुरझाई हुई, ठंड आई, हदयावसाद आदि।
     चिकित्सा- (1) वमन कराने के लिये एपो फोन 2 से 4 मि.ग्रा. का इंजेक्शन त्वचा या मांस में लगाया। इंजेक्शन के 15 मिनट बाद के आ जाएगी।
(2) टेनिक एसिड युक्तजल से स्टीमक ट्यूब द्वारा आमाशय को धोयें।
(8) एमाइल नाइट्रेट मुंघायें।
(4) एट्रोपीन का त्वचा में इंजेक्शन लगावे।
(5) अवसाद को दूर करने के लिये हाइपरटॉनिक सेलाइन सॉल्यूशन का शिरा में पोस्ट इंजेक्शन लगायें। स्टर्क्लीन और डिजीटेलिस का इंजेक्शन लगायें।
(6) पिसी सोंठ तथा घी पिलाय। शरीर को गर्म रखें।

9. संखिया (Arsenic)

लक्षण- जीभ या आंख को पलकों का फूलना, चेहरा लाल, हल्लास, मूळ, अम, रक्त मिश्रित अतिसार, सिरदर्द, मुखपाक, प्यास अधिक लगना, पेट में दर्द, भयानक यमन, श्वास कष्ट, खाँसी, खि धसी हुई, पुलिया का फलना. मूत्राबात, एण्ठन, अवसाद, आकेप, मृत्यु आदि।
     चिकित्सा- (1) एडिनलीन हाइड्रोक्लोराइड का लचा में इंजेक्शन लगाये।
(2) शिरा या गुदा मार्ग में नामल या हाइपरटोनिक (Hypernonic) सेलाइन प्रवेश करें (3) हेक्स्ट्रोज 25 प्रतिशत घोल का त्वचा में, चर्म शोधन दूर आरने के लिये इंजेक्शन के ( सोडियम बायोसल्फट की क्रम से 0.45, 0.6 तथा 0.9 ग्राम दवा की 5 मि.ली. डिस्टिल्ड वाटर में पोलकर तीसरे दिन शिरा में इंजेक्शन लगायें।
(5) आँखें अन्दर धंस जाने पर ग्लूकोज के 25 प्रतिशत सॉम्पशन का शिरा में 50 मि.ली. क मात्रा में इंजेक्शन लगायें।

10. विषैले कीड़ों का डंक मारना (insect Bite) 

लक्षण- विच्छेद, मधुमक्खी, ततैया के डंक में सख्त दर्द, जलन, शोध, बेचैमी होती है।
      चिकित्सा- (1) लिकर अमोनिया फोर्ट को डंक पर लगायें।
(2) पोटास परमंगनेट का वर्ण इंक पर डालकर नींबू का रस डालकर रंगई।
(3) साइट्रिक एसिड के कुछ कण डंक पर डालकर 1-2 बंद जल डालें।
(4) जाइलोकेन मरहम Xylocaine Ointment (एस्ट्राजेनेका) या सॉल्यूशन डंक पर लगाये
(5) एन्थिकल Anthical (एल्डर) लोशन-डंक से पीड़ित त्वचा पर इसे 3-4 बार प्रतिदिन लगायें।
(6) लिग्नोकेन Lignocaine 2% (कैडिला)-2 मि.ली. का डंक के आसपास के टिशूज में इंजेक्शन लगाएं।
(7) जेसिका Gesicain (पीरामल हेल्थ केयर) जेली-उसे डंक के आसपास लगायें।

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